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Showing posts from July, 2021

हुंडरु 2

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 दादा आपलोग क्या बना रहे ?  'जंगल की लकड़ियों से कुछ बना लेते हैं ' । आप किस जनजाति से हैं ? ' हमलोग आदिवासी ही हैं - बेदिया  ' हमारे समाज में बहुत नशा है महुआ और हंडिया पी कर सब पड़े रहते हैं । ओह ! आप लोग पीते हो ? नहीं मैं बिल्कुल नहीं  दो लोगों ने स्वीकार किया । ये भी बताया हमलोग जबतक जिंदा हैं तब तक ये बना रहे । हमारे बच्चे नहीं बनायेंगे ।मेरे बेटे ने आई . टी . आई की है । पन बिजली  प्लांट में काम करता है ।  मैं थोड़ी खुश और थोड़ी दु:खी हो कुछ चीजों के पैसे पूछने लगी । पेंट क्यों नहीं किए ? दाम ज्यादा होने पर लोग लेते नहीं । मुझे खुद पर शर्म आई 200 रूपए देकर बोली दादा जो दे सकते हो दे दो । थोड़ी खुशी और इस कला के ख़तम होने के भय के साथ सीढ़ियां चढने लगी ।

हुंडरु

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 अनुभव  यह बताते हैं कि लौटते वक्त का रास्ता छोटा हो जाता है लेकिन सीढ़ियों वाला रास्ता उतरते वक्त  आसान होता है । हुंडरू जलप्रपात तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों को उतरते समय एक उमंग थी एक तेजी थी लेकिन लौटते समय 500 सीढ़ियों को चढ़ने के बाद मैं बड़बड़ा रही थी अरे , नीचे उतरना जितना ही सरल होता है उसी रास्ते ऊपर चढ़ ना कितना कठिन ।      तभी दो आदिवासी बच्चे उपर से उतरते दिखे उनके सर पर था  दुनिया का पहला हथियार जिसे मनुष्य ने जानवरों से रक्षा के लिए इस्तेमाल किया होगा क्योंकि आदिम मनुष्य की औसत आयु काफी रहती थी इस कारण बुढ़ापे की लाठी बाद में बनाई होगी ।           पहली इस्तेमाल लाठी को क्या पता होगा कि वो बुढ़ापे का सहारा और कितने ही  मुहावरों में वह प्रयुक्त होगा । पुलिस के हाथ में आते ही ' लाठीचार्ज '  जैसी ख़बर ,फिर मास्टरजी इसके छोटे रूप को अपना डंडा बनायेंगे । गांव - देहात में आज भी  बांस के कोठ से सबसे मजबूत लाठी काटकर लाई  जाती और उसे तेल पिलाकर मजबूत बनाने की कोशिशे जारी थीं ।     लाठ...

अनोखा रसोईया

  अजब थी उसकी रसोई था वो ऐसा रसोइया  जो तैयार करता सबकी रसोई । हरा - भरा खड़ा वो  अपनी पत्तियों में ही करता ऐसा जादू   जिसके पकवान की खुशबू से  सब कहते बस अब मैं खा लूं। सूरज की किरणों के संग मिल  क्लोरोफिल से   खुलता स्टोमाटा सा दरवाज़ा  कार्बन डाइऑक्साइड के साथ मिलता जब पानी   ठीक तभी तैयार हो जाती उसकी रसोई .  हरे पौधे खड़े-खड़े ही देते सबको पोषण  कार्बोहाइड्रेट के साथ मिलता जाता नवजीवन और संग मिलता सबकी सांसों का ऑक्सीजन । वाह रे ! रसोइये तूने क्या ख़ूब रसोई बनाई दूर खड़ी मुन्नी भी मंद - मंद  मुस्काई । - विनीता

दामोदर नदी ( Patratu) खोजने होंगे नदियों के नए नाम

प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के संबंध में भारतीय समाज का कोई सानी नहीं है । भारतीय समाज की पहुंच को उसके द्वारा नदियों के नामकरण में देखा जा सकता है । नदी का मतलब ही होता है प्रवाह , भारतीय अधिकांश नदियों के नाम स्त्रियों के नाम पर हैं यानि नदी के गुण और मातृशक्ति को मान्यता देना । कुछ नदियों के ही नाम पुरुष परक है जिनमें ब्रह्मपुत्र और दामोदर प्रमुख हैं । इन नदियों की सहायक नदी बराकर, लोहित,अजय वगैरह नाम भी पुरुष वाले हैं । ध्यान देने योग्य बात है कि नदियों के प्रवाह की तेजी , तुरंत बाढ़ अा जाना इन सभी गुणों को देखते हुए बंगाल की कुछ नदियों का नाम पुरुष वाले हैं ।  नदी को समझना इतना आसान नहीं नदी का अपना भूगोल है और अपने अलग - अलग अंग । जन्मस्थान उद्गम है तो दो नदियों से मिलने का स्थान संगम। नदी का संपूर्ण शरीर उसका कछार है । नदी का प्रवाह तंत्र हमारी धमनियों के रक्त प्रवाह सरीखा ही तो होता है । नदी आगे बढ़ते जाती है उसका कैचमेंट एरिया बढ़ते जाता है ।     ' बंगाल का शोक ' कही जानेवाली नदी दामोदर झारखंड के लिए ऊर्जा दायिनी है ।  पश्चिम बंगाल तथा झारखंड में बहने वाली द...