हुंडरु

 अनुभव  यह बताते हैं कि लौटते वक्त का रास्ता छोटा हो जाता है लेकिन सीढ़ियों वाला रास्ता उतरते वक्त  आसान होता है । हुंडरू जलप्रपात तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों को उतरते समय एक उमंग थी एक तेजी थी लेकिन लौटते समय 500 सीढ़ियों को चढ़ने के बाद मैं बड़बड़ा रही थी अरे , नीचे उतरना जितना ही सरल होता है उसी रास्ते ऊपर चढ़


ना कितना कठिन ।  

   तभी दो आदिवासी बच्चे उपर से उतरते दिखे उनके सर पर था  दुनिया का पहला हथियार जिसे मनुष्य ने जानवरों से रक्षा के लिए इस्तेमाल किया होगा क्योंकि आदिम मनुष्य की औसत आयु काफी रहती थी इस कारण बुढ़ापे की लाठी बाद में बनाई होगी ।     

     पहली इस्तेमाल लाठी को क्या पता होगा कि वो बुढ़ापे का सहारा और कितने ही  मुहावरों में वह प्रयुक्त होगा । पुलिस के हाथ में आते ही ' लाठीचार्ज '  जैसी ख़बर ,फिर मास्टरजी इसके छोटे रूप को अपना डंडा बनायेंगे । गांव - देहात में आज भी  बांस के कोठ से सबसे मजबूत लाठी काटकर लाई  जाती और उसे तेल पिलाकर मजबूत बनाने की कोशिशे जारी थीं ।

    लाठी जैसी मजबूत और आज भी प्रासंगिक हथियार को जब इन छोटे मासूम बच्चों के हाथों में देखी तो  टोके बिना नहीं रह सकी ।

    बच्चों ने बताया - ' मां ने दस - दस लाठियां बेचने को दी है '। स्कूल जाने की बात पर बच्चों ने गोल - गोल जवाब दे दिया ।

 जब उनके बाबा के बारे में पूछा तो बच्चों ने बात छुपानी चाही । मेरे जिद के बाद बताया कि रोज़ सुबह से ही पीकर कहीं पडे रहता है । 

  मैं उन सहारे की दस लाठियों को खरीद उन बच्चों को फिर से दे दी । मांड - भात  की आस में  सहारे को भी  किसी का सहारा बनना होता है । रोज़ लोगों के लिए लाठी बेचने वाले छोटे हाथ इस छोटी उम्र में मां की लाठी बने हुए हैं ।



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