अनोखा रसोईया

 


अजब थी उसकी रसोई

था वो ऐसा रसोइया

 जो तैयार करता सबकी रसोई ।


हरा - भरा खड़ा वो 

अपनी पत्तियों में ही करता ऐसा जादू 

 जिसके पकवान की खुशबू से 

सब कहते बस अब मैं खा लूं।


सूरज की किरणों के संग मिल  क्लोरोफिल से  

खुलता स्टोमाटा सा दरवाज़ा 

कार्बन डाइऑक्साइड के साथ मिलता जब पानी  

ठीक तभी तैयार हो जाती उसकी रसोई . 


हरे पौधे खड़े-खड़े ही देते सबको पोषण 

कार्बोहाइड्रेट के साथ मिलता जाता नवजीवन

और संग मिलता

सबकी सांसों का ऑक्सीजन ।


वाह रे ! रसोइये तूने क्या ख़ूब रसोई बनाई

दूर खड़ी मुन्नी भी मंद - मंद 

मुस्काई ।


- विनीता

Comments

Popular posts from this blog

दामोदर नदी ( Patratu) खोजने होंगे नदियों के नए नाम

हुंडरु